काम, क्रोध, लोभ और अहंकार ही असली रावण, इन्हें खत्म करने का लें संकल्प
काम, क्रोध, लोभ और अहंकार ही असली रावण, इन्हें खत्म करने का लें संकल्प
सिरसा :- (अक्षित कम्बोज )दशहरा हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहारों में से एक हैं जो बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष्य के रूप में पूरे भारत वर्ष में बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता हैं तथा अन्य देशों में भी अनोखे रीति-रिवाजो, परम्पराओं और बडे़ उत्साह के साथ मनाया जाता है तथा यह त्यौहार हमारे भीतर की नकारात्मक उर्जा और बुराई को खत्म करने और शुभ मुहुर्त की शुरूआत करने का भी संकेत देता हैं। यह शब्द जूना अखाड़़ा के संत महंत विष्णु देवा नंद गिरी जी महाराज ने स्थानीय कोर्ट कालोनी में नगर कीर्तन व प्रभात फेरी के उपलक्ष्य में साधकों को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये।उन्होंने कहा कि दशहरे के दिन भगवान श्री राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी और इसी दिन नवरात्रों की समाप्ति भी होती हैं तथा देवी की प्रतिमा का विर्सजन भी होता हैं एवं अस्त्र-शस्त्र की पूजा की जाती हैं तथा यह त्यौहार विजय पर्व के रूप मंे मनाया जाता हैं। उन्होंने कहा कि दशहरा हमें सिखाता हैं कि अच्छाई की हमेशा बुराई पर जीत होती हैं तथा यह हमें सत्य और धार्मिकता का महत्त्व भी बताता हैं तथा अंधेरे से प्रकाश की और ले जाता हैं। उन्होंने कहा कि दशहरे के त्यौहार से पहले राम-लीलाओं का आयोजन किया जाता हैं व दशहरे के दिन रामलीला के आयोजक रावण व उसके भाईयों के पुतले बनाते हैं और फिर उन्हें जलाते हैं जो हमें ये सिखाते हैं कि अच्छे कार्य हमेशा बुरे लोगों पर विजय प्राप्त करते हैं।श्री साहुवाला ने कहा रावण के दस सिरों का मतलब है कि हमारे भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, आलस्य, अहंकार, असत्य और अन्याय जैसें दस विकार भरे पडे है और यह पर्व हमें सिखाता हैं कि हमे केवल रावण के पुतले को नहीं जलाना बल्कि अपने भीतर इन दोषों को भी जलाकर नष्ट करना है इसलिए आइए हम सभी संकल्प लेते है कि हम अपने जीवन में सत्य को अपनाएँगे, धर्म के मार्ग पर चलेंगे और दिन-दुखियों की सेवा करेंगे। उन्होंने कहा हम श्री राम के आदर्शों से प्ररेणा लेकर सदा ही सत्य, प्रेम, सदभावना व अच्छाई के मार्ग पर चलेगें और अपने जीवन से भौतिक एवं वैचारिक अपवित्रता को दूर कर असहायों की निःस्वार्थ सहायता करने का संकल्प लेते हैं। उन्होंने कहा रावण का दहन प्रतीक हैं उस ज्ञान के विनाश का, जिसमें संयम, न्याय और धर्म का अभाव हो तथा रावण की यह तृष्णा केवल उसका ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लंका साम्राज्य का विनाश कर गई। उन्होंने कहा राम-रावण युद्ध केवल एक युद्ध नहीं था बल्कि वह क्षण था जब धरती पर धर्म का एक ऐसा दीपक जला, जिसकी रोशनी आज तक रामराज्य की परिकल्पना में जगमगा रही हैं ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी यह याद रहे-एक राजा की व्यक्तिगत तृष्णा सम्पूर्ण राष्ट्र को नष्ट कर सकती है।श्री साहुवाला ने कहा कि जिस प्रकार दक्षिण भारत में भगवान शिव पुजनीय हैं और रावण भगवान शिव का एक मुख्य अनुयायी था। इसलिए कहा जाता हैं कि लोग रावण की भक्ति की पूजा करते हैं और वे लोग रावण का पुतला बनाकर नहीं जलाते हंै। श्री साहुवाला ने कहा कि हमें भी रावण का पुतला नहीं जलाना चाहिए क्योंकि इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता हैं, एवं प्रदूषण फैलता हैं और कई जगह तो लोग जलते हुए रावण की लकड़िया लेने पहुंच जाते हैं जिससे उनके शरीर का नुकसान हो जाता हैं। इसलिए हमें यह त्यौहार प्रेम, भाईचारा और मिलजुल कर आपस में मिठाई खिलाकर मनाना चाहिए। इस अवसर पर महंत विष्णु देवा नंद गिरी जी महाराज, शोम नंद गिरी जी महाराज, हिम नंद गिरी जी महाराज, राकेश नंद गिरी जी महाराज, सागर नंद गिरी जा महाराज ने नगर कीर्तन एवं भजन कीर्तन किया और आए हुए सभी भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। अंत में महंत विष्णु देवा नंद गिरी जी महाराज को स्वामी रमेश साहुवाला ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर संदीप नीलम, रीना, प्रणव, पवन, अमर, रितुन, मोहित, दिनेश, रीना, पारुल, रजनी, दीपा, जानवी, पायल, भावना, प्रणव, विजय व अन्य उपस्थित थे।




