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स्वामी रमेश साहुवाला ने बताया शीतला माता की पूजा का धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व II

स्वामी रमेश साहुवाला ने बताया शीतला माता की पूजा का धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व II

सिरसा-(अक्षित कम्बोज ):- भारतीय संस्कृति में देवी-देवताओं की पूजा केवल आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि उसमें स्वास्थ्य, विज्ञान और सामाजिक जीवन के गहरे सूत्र छिपे होते हैं। ऐसी ही एक देवी हैं माता शीतला, जिन्हें रोग निवारण, स्वच्छता और शीतलता की देवी माना जाता हैं। ये शब्द लायन्स क्लब सिरसा अमर के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी रमेश साहुवाला ने स्थानीय चतरगढ़ पट्टी में माता शीतला एवं काली माता का तीसरा विशाल जागरण, भण्डारा एवं पूजा पाठ में बतौर मुख्यातिथी व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शीतला शब्द का अर्थ ही हैं ठंडक देने वाली। स्कंद पुराण के अनुसार माता शीतला का वाहन गधा हैं, जो विनम्रता और साधारण जीवन का प्रतीक हैं। उनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते होते हैं। इन सभी वस्तुओं का प्रतीकात्मक महत्त्व हैं। उन्होंने बताया कि कलश में शीतल जल होता है जो रोगी को राहत देता हैं। सूप से हवा की जाती हैं ताकि चेचक के रोगी को शीतलता मिले तथा झाडू स्वच्छता का प्रतीक हैं और नीम के पत्तों में औषधीय गुण होते हैं जो फफोलों को सड़ने नहीं देते। मान्यता हैं कि गधे की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। #newstodayhry @newstodayhry

श्री साहुवाला ने कहा कि माता शीतला के साथ ज्वरासुर, ओलै चंडी बीबी, घेटुकर्ण और रक्तवती जैसे देवता भी दिखाए जाते हैं:-

जो ज्वर, हैजा, त्वचा रोग और रक्त संक्रमण से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि पौराणिक कथा के अनुसार शीतला माता की उत्पत्ति भगवान ब्रहमा से हुई थी। वे शक्ति अवतार हैं और भगवान शिव की जीवनसंगिनी मानी जाती है। उन्होंने कहा कि एक कथा के अनुसार माता शीतला देवलोक से ज्वरासुर नामक दैत्य को साथ लेकर धरती पर आई थी। राजा विराट ने जब उन्हें स्थान नहीं दिया तो माता क्रोधित हो गई और प्रजा को चेचक जैसे रोग हो गए। बाद में राजा ने ठंडा दूध और लस्सी चढ़ाकर माता को प्रसन्न किया, तभी से शीतला अष्टमी पर ठंडा और बासी भोजन चढ़ाने की परम्परा शुरू हुई। उन्होंने कहा कि शीतला माता की पूजा मुख्य रूप से शीतला अष्टमी या बसोरा के दिन की जाती हैं जो फाल्गुन या चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ती हैं। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले बना भोजन ही माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक परम्परा नहीं, बल्कि स्वच्छता, संयम और स्वास्थ्य का अभ्यास और पूजा में नीम की पत्तियां, ठंडा जल, ठंडा दूध और झाड़ू का प्रयोग होता हैं। शास्त्रों में माता की वंदना के लिए शीतलाष्टक स्त्रोत बताया गया हैं जिसकी रचना भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए की थी। #newstodayhry @newstodayhry

श्री साहुवाला ने यह भी कहा कि:-

शीतला माता की पूजा का मूल संदेश स्वच्छता और स्वास्थ्य हैं। प्राचीन काल में जब चिकित्सा विज्ञान विकसित नहीं था, तब लोग देवी की आराधना के माध्यम से चेचक जैसे रोगों से बचाव करते थे। उन्होंने कहा कि आज भी यह पर्व हमें सिखाता हैं कि स्वच्छता, शीतलता और अनुशासित जीवन ही रोगों से बचने का उपाय हैं। इससे पूर्व सरला माता एवं रचना बेनीवाल ने मुख्यातिथी स्वामी रमेश साहुवाला का वहां पहुंचने पर स्वागत किया। इस अवसर पर स्वामी रमेश साहुवाला ने माता रानी की ज्योत प्रचंड की और पूजा अर्चना की और भण्डारे का शुभारम्भ किया जिसमें हजारों की संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया । इस अवसर पर विकास म्यूजिकल ग्रुप ने अपनी प्रस्तुति में सुंदर-सुंदर भजन गाए और माता रानी का गुणगान किया जिससे उपस्थित सभी श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए। इस अवसर पर सोनिया, राजेश कुमार, रीतुन साहुवाला, नीलम, ज्योति, पायल, दिव्या, अर्चना, सुनिता एवं अन्य उपस्थित थे। #newstodayhry @newstodayhry

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