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पाप का मूल अज्ञान और स्वार्थ है  ll

पाप का मूल अज्ञान और स्वार्थ है ll

सिरसा – (अक्षित कम्बोज ) हिन्दू दर्शन के अनुसार पाप का मूल अज्ञान और स्वार्थ है जो कर्म, विचार, व्यवहार, धर्म, नैतिकता, ईश्वरीय नियमों के विरूद्ध हो तथा आत्महत्या, चोरी, हिंसा, अनैतिक व्यवहार भी पाप के अंतर्गत आते है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह पाप के द्वार है। यह शब्द लाॅयन्स क्लब सिरसा अमर के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी रमेश साहुवाला ने विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर साधको को स्थानीय ध्यान मंदिर में कहें। उन्होंने कहा पाप का मूल स्त्रोत मन ही है क्योंकि कर्म की शुरुआत विचार से होती है। इसलिए मन को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है क्योंकि यही पाप और पुण्य का बीज हैं जबकि इंद्रियों और मन पर सयंम रखकर व्यक्ति पाप से बच सकता है। श्री साहुवाला ने कहा रामायण के अनुसार पाप वह कर्म है जो धर्म, सत्य और नैतिकता के विरूद्ध को तथा जो धर्म, समाज और आत्मा के प्रति कर्तव्य का उल्लघंन करता है। उन्होंने कहा झूठ बोलना, निंदा करना और कठोर वचन बोलना भी पाप की श्रेणी में आते है तथा दूसरे का धन हड़पने की इच्छा, गलत कार्यों को करने का प्रयास तथा दूसरों को शारीरिक, मानसिक व आध्यातमिक रूप से चोट पहुँचना भी पाप की श्रेणी में आता है। उन्होंने कहा कि पुण्य वह अंश है जो जोड़ता है, पाप वह है जो तोड़ता है तथा पुण्य से मन हल्का होता है, पाप से मन भारी होता है। उन्होंने कहा कि पाप से बचने का उपाय गंगा में डुबकी नहीं, मन की शुद्धि है क्योंकि यदि मन पवित्र है तो कर्म अपने आप पवित्र हो जाएंगे। श्री साहुवाला ने कहा बुरे कर्म विनाश की ओर ले जाते है तथा अच्छे कर्मों से व्यक्ति उच्च स्तर पर पहुँच सकता है तथा अंत में अच्छाई की बुराई पर विजय होती है। उन्होंने कहा पाप के परिणाम स्वरूप दुख और विनाश होता है तथा सत्य, धर्म और नैतिकता के पथ पर लौटने से मुक्ति संभव होती है। उन्होंने कहा व्यक्ति को आत्महत्या के बारे मे नही सोचना चाहिए अगर कोई ऐसा करने के बारे में सोचता है तो इससे बड़ा पाप ओर कुछ नहीं हो सकता। इसलिए हमें शुभ कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। इस अवसर पर अमर साहुवाला, रितुन साहुवाला, विजय गोयल, संदीप कुमार, पवन कुमार, रविंद्र, वासु, नीलम, पारुल, रीना, भावना राजपुत व पायल उपस्थित थे। @newstodayhry #newstodayhry

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